शुक्रवार 2 जनवरी 2026 - 16:51
इल्मी जिहाद, हौज़ा ए इल्मिया की तहरीक का मरकज़ है / दीन-ए-ख़ुदा की ख़िदमत एक अज़ीम नेमत है

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ख़य्यात ने “पेशरफ़्ता और मुम्ताज़ हौज़ा” के पैग़ाम की तरफ़ इशारा करते हुए इल्मी जिहाद और हौज़ा ए इल्मिया के इल्मी, सक़ाफ़ती और तरबियती धारों को मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,प्रमुख हौज़ा ए इल्मिया ख़ुरासान हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अली ख़य्यात ने हौज़ा इल्मिया ख़ुरासान के मदरसों के मुहतमिमीन और अराकीन के साथ मुनअक़िद इजलास से ख़िताब करते हुए मौजूदा हालात में इल्मी, सक़ाफ़ती और तरबियती सरगर्मियों की अहमियत की तरफ़ इशारा किया।

उन्होंने कहा कि इस वक़्त और इस ख़ास सूरत-ए-हाल में ज़रूरी है कि हम इल्मी जिहाद को अपने काम का मरकज़ बनाएं और जिहादी रूह और मुसलसल कोशिश के साथ हौज़ा इल्मिया के इल्मी धारे को, जो दूसरे धारों की रहनुमाई करता है, और ज़्यादा मज़बूत करें, क्योंकि आज हौज़ा ए इल्मिया न सिर्फ़ इल्मी बल्कि सक़ाफ़ती और तरबियती धारों की भी रहनुमाई कर रहा है।

उन्होंने कहा कि अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की कई दुआओं में, जिनमें दुआ-ए-कुमैल भी शामिल है, गुनाहों के असरात की तरफ़ इशारा किया गया है। अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम उन गुनाहों की निशानदेही फ़रमाते हैं जो मुसीबतों के नाज़िल होने, दुआओं के रुक जाने और नेमतों के बदल जाने का सबब बनती हैं।

दूसरी रिवायात में, जैसे कि इमाम काज़िम अलैहिस्सलाम से मनक़ूल है, इंसान की ज़िंदगी में आने वाली बहुत-सी मुश्किलें, परेशानीयां और मुसीबतें इन्हीं ग़फ़लतों और आलूदगियों का नतीजा होती हैं।

हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ख़य्यात ने गुनाह और नेमतों की नाशुक्री के दरमियान ताल्लुक़ पर ज़ोर देते हुए कहा कि जो असर गुनाह इंसान की ज़िंदगी पर डालता है, वही असर अल्लाही नेमतों की तरफ़ तवज्जो न देने और उनकी शुक्रगुज़ारी में कोताही की वजह से भी ज़ाहिर होता है।

उन्होंने आगे कहा कि सहिफ़ा-ए-सज्जादिया की पहली दुआ में इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने बहुत ख़ूबसूरती से इस हक़ीक़त को बयान फ़रमाया है कि अल्लाही नेमतों में बग़ैर शुक्रगुज़ारी के तसर्रुफ़, इंसान को इंसानियत के दायरे से बाहर कर देता है।

इसी तरह इमाम जवाद अलैहिस्सलाम ने भी इस बात पर ज़ोर दिया है कि अल्लाही नेमत, अपनी अज़मत के मुताबिक़ शुक्र की तक़ाज़ा करती है।मुदीर हौज़ा इल्मिया ख़ुरासान ने कहा कि सबसे बड़ी नेमत जो ख़ुदावंद ने हमें और आप को अता फ़रमाई है, वह दीन-ए-ख़ुदा की ख़िदमत, इमाम-ए-ज़माना अज्जलल्लाह तआला फ़रजहुश्शरीफ़ के सिपाहियों की ख़िदमत और उन लोगों की ख़िदमत है जो हज़रत वली-ए-असर (अज) की तवज्जो के हक़दार हैं।

यह नेमत बहुत ज़्यादा शुक्रगुज़ारी की मुतालिब है। अगरचे इस नेमत के साथ मुश्किलें, मशक्क़तें और सख़्तियां भी हैं, लेकिन इस अज़ीम नेमत की क़द्र करनी चाहिए और इसका शुक्र अपने फ़राइज़ की अंजामदेही, मुसलसल मुजाहदा और तरबियती अहद के ज़रिये ज़ाहिर करना चाहिए, ताकि ख़ुदा न ख़ास्ता हम मासूमीन अलैहिमुस्सलाम की तनबीहात का मिस्दाक़ न बनें।

उन्होंने कहा कि मोमिन, सालेह और लाइक़ इंसानों की तरबियत का अज़ीम काम, जो ख़ुद अल्लाही दीन के ख़ादिम बनेंगे, बहुत क़ीमती काम है, बल्कि ख़िदमत के तमाम उनवानात में इससे बढ़कर और बुलंदतर ख़िदमत का तसव्वुर करना भी मुश्किल है।

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